धर्म की व्यापकता एवं उसका स्वरुप

धर्म की व्यापकता एवं उसका स्वरुप

धर्म की व्यापकता एवं उसका स्वरुप

धर्म और ईश्वर को आधुनिक समय में विवादों से परिपूर्ण कर दिया गया है, आज मानव के तर्कों ने धर्म और ईश्वर को बहस का एक मुद्दा बना कर रख दिया है। धर्म क्या है और ईश्वर क्या है इस बात को समझना बड़ा ही आसान है। धर्म वह सतत प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य ईश्वर को पाना होता है। उद्देश्य की महत्ता प्राथमिक होती है अर्थात ईश्वर की प्राप्ति हीं प्राथमिकता है। यहाँ एक बात बताना मैं आपको महत्वपूर्ण समझता हूँ की चूँकि परिवर्तन हीं इस संसार का नियम है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समय के इस चक्र ने बहुत सारी चीजों में परिवर्तन ला दिया है तभी तो धर्म कई हो गए परंतु ईश्वर एक हीं है। अर्थात उद्देश्य आज भी वही है बस प्रक्रिया कई तरीके के हो गए। अब अगर प्रक्रिया की समझ गलत हो जाए तो यह बिल्कूल सत्य है कि ईश्वर में भी गलतियाँ दिखाई देने लगेगी। अतः प्रक्रिया का आधार मानवीय मूल्यों पर होना चाहिए, विकृत मानसिकता और पाश्विक प्रवृति से ईश्वर को पाना असंभव है तथा इस प्रक्रिया से जगत का नुकसान अटल है।

सटीक विश्लेश :

धर्म के आधार पर ईश्वर को प्राप्त करने से बेहतर है कि ईश्वर की प्राप्ति कर के धर्म की अनुभूति की जाए। परंतु इस प्रक्रिया के लिए हमें मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों को प्राथमिकता देना होगा, समझ को कहीं दूर छोड़ना होगा। आखिर ईश्वर की प्राप्ति संवेदनशीलता को त्याग कर हो सकती है क्या?

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