क्या इंसान का रुतबा भगवान के समान होने लगा है!

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क्या इंसान का रुतबा भगवान के समान होने लगा है! (विशाल की कलम से)




परिवर्तन, सृष्टि का एक अटल सत्य है। हर क्षण कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहता है। समय की लहरें, अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाती है, चाहे वह “नाम” हो या “निशान”। पर हाँ, कुछ चीजें छोड़ भी जाती है, जैसे चरित्र को, व्यवहार को, आपकी संजीदगी को। वर्तमान समय में मनुष्य की प्रवृति अब भगवान के समकक्ष होने लगी है, वह स्वयं को निर्माता समझने लगा है, दूसरों का भाग्य-निर्माता। मनुष्य जिस गुण के कारण मनुष्य है अर्थात संवेदनशीलता, आज वही गुण मनुष्य के भीतर से समाप्त होते जा रहा है। जैसे-जैसे संवेदनशीलता समाप्त हो रही है, क्रूरता हावी हो रही है, और जैसे-जैसे क्रूरता हावी हो रही है, वैसे-वैसे मनुष्य पशु के चरित्र को धारण करने की ओर अग्रसर हो रहा है। आज एक-दूसरे से ऊँचा दिखाने, एक-दूसरे को गिराने की होड़ लगी है। ममता, भावना, प्यार आदि का तो जैसे इंसान मतलब हीं भूलने लगा है। लेकिन जिस विषय का जिक्र करना अतिआवश्यक है, वह है कि ऊँचा दिखने की प्रवृति इतनी बढ़ सी गयी है, कि इंसान अब इन्सान से ऊपर उठ गया है, यूँ कहें तो इंसान अब अपने आप को भगवान के समकक्ष समझने लगा है। इसे समझ का फेर कहें या बुद्धिहीनता की पराकाष्ठा लेकिन दोनों हीं परिस्थितियों में यह अत्यंत घातक है। मानवता को ताख पर रखके मनुष्य वास्तव में पशु होने लगा है किंतु समझ के फेर ने उसे बुद्धिमान होने के भ्रम में डाल रखा है।

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